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Hymn No. 547 | Date: 04-Jan-1999
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हर बार तूने हमपे रहम किया, जख्म दिया हमनें तूझे हर बार।
हर बार तूने हमपे रहम किया, जख्म दिया हमनें तूझे हर बार।
तूने चाहा सदा हमपे इनायत बरसाना, उस इनायत को हमनें पहचानना ना सीखा ।
पुकारा कई बार हमनें तूझे, खुदकें दिल का द्वार ना खोला कभी तेरे लिये ।
मिला मैं तुझसे सौ – सौ बार, मिलन की तमन्ना आज तक बाकी है दिल को ।
याद किया मैंने तूझे कई बार, पता ना कर पाया क्या तूने चाहा है हमशे।
श्वास दर श्वास तूने हित किया हमारा, क्यों बिसार देते है हम तेरी बातें ।
जब – जब लडखडायें हम तूने लिया सम्हाल, मौका पातें मन लगाया कहीं ओर।
तू ही लेकें चल सकता है हमको, तेरे बतायें राह पे, हमारें बस की बात ना है ।
जो कुछ भी हो मैं सच कहता हूँ तुझसे, साथ तेरा हम ढुंडते है हर बार।
जहाँ तू लें जाये वहाँ चला जाना चाहता हूँ, मैं अपनी सुध छोडके बेसुध हो जाना चाहता हूँ ।


- डॉ.संतोष सिंह