VIEW HYMN

Hymn No. 548 | Date: 04-Jan-1999
Text Size
हालत हो जात है मेरी पतली, जब देखता हूँ अपना व्यवहार नकली ।
हालत हो जात है मेरी पतली, जब देखता हूँ अपना व्यवहार नकली ।
जानतें हुये भी मैं खुदको, व्यवहार बदला – बदला करता हूँ खुदशें।
दुसरों से ज्यादा मैं खुदको हूँ समझता, फिर क्यों नहीं स्वीकार कर पाता हूँ ।
आवाज दिल की कई बार सुनी, हर बार दबाकें मनमानी की अपनीं।
साथ निभाया उसनें अब तक, हमनें साथ निभाना ना सीखा ।
सच्ची कहानीं को छिपा कें, मनगढत कहानी सुनाया, अपने आपको झुठलाया।
बहुत फुसलाया दिल को अपने, पर उसनें ना हार मानीं, ना ही कोई बात मानी।
मुझें दर्पण दिखाकें नम्न किया सौ – सौ बार, मुंह फेंरा हमनें सच्चाई से हर बार।
हारनें लगा हुँ मा उससे, इस हार में मेंरी जीत है, इस बात को स्वीकार क्यों नहीं कर पाता।
कीसी भी पल समर्पण करना होगा, दिल के हाथों, सजग रहना बस मुझे है।


- डॉ.संतोष सिंह