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Hymn No. 550 | Date: 04-Jan-1999
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परम् की बात कैसे करूं मैं, अंधा मैं क्याँ जानू रोशनी होती है क्याँ ।
परम् की बात कैसे करूं मैं, अंधा मैं क्याँ जानू रोशनी होती है क्याँ ।
झलक दिखाता है वो देख नहीं पाता मेरा मन, जो उलझा रहता है माया में ।
ज्ञान देनें की कोशीश बहुत की उसनें, चाह करकें भी ग्रहण कर ना सका मैं ।
वहत दें जात है दिल को प्यार भरी उसकी बातें शरम से गड जात है नजर हमारीं ।
देना चाहता है वो हमें अतूल साम्राज्य अपना, हम छोड नहीं पाते है अपने आदतें।
बडा दुष्कर लगता है तेरे करीब रहना, परम् प्रिय तू साध लें हमारें मन को।
कोई सवाल ना करना हूँ चाहता तुझसे सब भूलाकें प्यार भरी बातें करना हूँ चाहता।
कर्मों के बाणों से आहत हुआ कई बार, तूने जख्मों पे लगाया प्यार का मलहम।
अजीज आ गया हूँ अपने आप से कूछ भी करकें तेरे करीब रहना हूँ चाहता ।
रखलें तेरे मातहत मुझको अपने, सपनों में ना हकीकत में बन जाना चाहता हूँ ।


- डॉ.संतोष सिंह