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Hymn No. 553 | Date: 05-Jan-1999
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सद्गुरू की बात हम क्या कर सकते है, उसके गुण गातें है परमेश्वर।
सद्गुरू की बात हम क्या कर सकते है, उसके गुण गातें है परमेश्वर।

परम् पिता जब भी धरा पे आतें है, सद्गुरू के शरण में जाते है।

पा कें भी खो देंगा तू ईश्वर को, सद्गुरू जीना सीखायें परम् के संग।

दुनिया के संग रहके हर धर्म निभातें हुये, दिल को डुबकी लगाना सीखाता है परम् में।

जो स्वर्ग में आनंद ना है मिलता, सद्गुरू के चरणों में वो यूं ही मिल जाता ।

जिसनें इस दिल को लगाया उसमें, अपने आपको भूलाकं मस्त होना सीखा उसमें ।

सुख हमारीं कल्पना से है परें, यह देहिक ना होके ऐहिक होता है ।

सद्गुरू का हाथ जिसनें पाया सर पे, हर ऐश्वर्य को छोड मग्न हुआ इस सुख में ।

देता है ईश्वर सबकूछ, कूछ ऐसा भी है जो मीलता है सद्गुरू की शरण में रहके ।

सद्गुरू हर शब्द से परे है, वह ईश्वर का गुणंगान करकें स्वयं ईश्वरमय है ।


- डॉ.संतोष सिंह