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Hymn No. 561 | Date: 07-Jan-1999
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तेरी लीला देखी अनेक, हर लीला के संग तूने रूप धरा नया – नया ।
तेरी लीला देखी अनेक, हर लीला के संग तूने रूप धरा नया – नया ।
झुमां खुद भी, झुमायां अपने भक्तों को, बिन कुछ कीये धरें वें पा गये तुझको ।
इस धरा पे तू अनेकों अनेक बार आया, जीवन के हर पहलु को जीतें हुये रमना सीखाया परमपिता में।
इन सबको छोडके हर रिश्तें – नातों से मुंह मोडके, दूर कहीं सच्चिदानंद के पहलु में रहना सीखाया।
मौज में तू रहता, तेरा जीवन देता संदेश मस्ती का, आनंद से भरपुर है ये जीवन।
माया तो गुलाम है तेरी, तुझको ना है कीसी की आवश्यकता, मस्त रहता है तू निज आनंद में।
तेरे लिये तो हर पल उत्सव है जुड़ा जो ईश्वर से।
तेरे रंग में भंग हम डालतें, इर्द - गिर्द चक्कर काटकें तेरे आनंद में खलल डालतें ।
हमें सालतें है करम हमारें प्रभु, जीवन का दर्रा बदलनें के लिये चाहते है तेरी कृपा।
माफ करना मेरे पिता, सदा आनंद में रहनें वाले कबूल करना प्रणाम मेरा ।
- डॉ.संतोष सिंह
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दिल में इक् बात है, जो कहनें का व्याकूल हूँ मैं तुझसे ।
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अहेतूक आनंद का दरिया है तू, मुझ जैसी कीतनी इच्छाधारी नदियाँ समर्पण करती है तुझमें ।
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