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Hymn No. 568 | Date: 08-Jan-1999
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तेरे गीत ही मेरे दिल की धडकन है, उनकी धूलनों पे झूमतें है हम ।
तेरे गीत ही मेरे दिल की धडकन है, उनकी धूलनों पे झूमतें है हम ।
साज तेरे हमारी श्वास है, उनसे उठी तरंगों पे जीते है हम ।
तेरी स्वर जहरियाँ जब गुंजती है, अनंत गगन के पटल पे वो ही तो दिल की आवाज है।
इन सबको अवरूध्द कर देती है हमारी अतृप्त इच्छायें ।
मन में तूफां उठनें लगतें है, तन दावानल में चीत्कार कर उठता है।
काम रूपी सर्व फुत्कारता है, अपने परायें का बिन भेद कीयें।
जकड जाते है बाहर से भीतर तक माया के वश में होके ।
तब दिन – रात भयानक सपनें आते है, हम चिल्ला उठतें है तुझसे मदद के लिये।
दयालु पिता तूरंत ही तू आता है, भर लेतां है हमको अपनी बाहो में ।
जो बिसार चुकें थें हम वो याद ताजा हो जाती है, ऐं परम् तू ना होनें देना हमको अपने से अलग।
सपनों की दुनिया से जगाकें, सदा के लिये शाश्वत संसार में लें चलना ।
जहाँ डर का नामोंनिशान ना हो, बस तेरे गीतों की गुंज हो औरत तू रहे ।
- डॉ.संतोष सिंह
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अभी तो शुरूआत है प्यार की, जब तेरे सर पे छायेंगा प्यार का जुनून ।
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याद सताती है तेरी, लुभाता आया है हमको तू सदा से ।
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