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Hymn No. 571 | Date: 09-Jan-1999
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बदल सकता है हर कोई वो, जो प्रभु के शरण में जाता।
बदल सकता है हर कोई वो, जो प्रभु के शरण में जाता।
प्रभु का कहाँ हुआ अक्षरश, अपने जीवन में है अपनाता।
संकट आते है स्वीकार करता है, उसकी कृपा समझकें।
कीतना दयालु है पिता मेरे, इतनें पे मुझको छोड दिया।
कुछ पा जाता है तो लाख – लाख देता धन्यवाद पिता को।
नायक ना थे हम इसकें, उसकी कृपा से यें मिला हमको ।
प्रभु के साथ जो प्यार की पीगें है बढाता, रच – बस जाता है प्रभु उसमें ।
मुस्कुरातें हुये वो सदा प्रभु कें प्यार में रहता है झुमता।
खाली – खाली सी बातें लगाती है जग की, जग का मतलब निकल जाता है मन से।
बाहर हो या भीतर, तन हो या मन, दिल को सबमें प्रभु है नजर आता।
- डॉ.संतोष सिंह
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कूछ ना छिपा है तुझसे, फिर भी छिपा के रखता है सब कूछ।
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