VIEW HYMN

Hymn No. 573 | Date: 09-Jan-1999
Text Size
यें क्याँ हो जाता है हमको, हमारा होश कहाँ जाता है ।
यें क्याँ हो जाता है हमको, हमारा होश कहाँ जाता है ।
हम कीसी को नहीं पातें है, जब उसके वश में हो जाते है।
कही दूर भीतर से बजतीं है, उसको मोहनी बसुरियाँ धीरें से ।
पगला जातें है सुनकें हम, छाता है मदहोशी का ऐसा आलम।
क्या बताऊँ क्या हाल होता है, बेसुध होनें पे भी आनंददायक होता है ।
छुटता चला जाता है खुद पे से नियंत्रण, होश आनें पे श्वास लेना पड़ता है ।
गत बुरी बन जाता है ये जब टुट जाता है सारा आलम ।
दिल बेकरार हो उठता है, उसकें धुनों पे थिरकनें के वास्तें ।
समझ कुछ भी नहीं आता, जाती है निकल हर समझ दिल से ।
तडप इतना उठता हूँ, उसका होके रह जाना चाहते है हम तो बस ।


- डॉ.संतोष सिंह