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Hymn No. 576 | Date: 09-Jan-1999
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क्याँ कहूँ प्रभु तुझसे, देखता है तू सब कुछ।
क्याँ कहूँ प्रभु तुझसे, देखता है तू सब कुछ।
रास नहीं आता दिल को कुछ, उचट गया है मन सबसे ।
कबसे कूछ अलग करना चाहता हूँ, समझ नहीं पाता क्या करूं।
जीवन यूं ही जीयें जा रहा हूँ, अनमोल क्षणों को व्यर्थ कीयें जा रहा हूँ।
टिक नहीं पाता मन में कुछ, टिकाना चाहता हूँ सब कुछ।
दिनों ब दिन निराशा से घिरतें जा रहा हूँ हताश होके।
जो हाथ खुले थें अब तक, बद्यतें जा रहे है खुद से।
नया कहुँ प्रार्थना में मैं तुझसे, समय मेरी जाती रही है ।
असहाय सा जीवन जीना नहीं चाहता, ना ही आहत करना चाहूँ कीसी दिल को।
फरियाद ना करूंगा मैं तुझसे, हाँ विश्वास मेंरा तू है ।
गीरता रहुंगा जमानें की नजरों में, ना गिरूंगा तेंरी नजरों में ।
पड़ने ना दूंगा दुखदायीं क्षणों का साया दिल पे ।
इक् बार और सर कटकें गिरेंगा, उफ् तक ना करूंगा।
मेंरी इक् प्रार्थना है तुझसे, जो भी हो मेंरा तेरे कहनें से हो ना ही करमों से ।


- डॉ.संतोष सिंह