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Hymn No. 579 | Date: 10-Jan-1999
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हर जख्म को सह लेंगे इस तन पे, दिल ना सह पायेंगा कुछ भी।
हर जख्म को सह लेंगे इस तन पे, दिल ना सह पायेंगा कुछ भी।
मन में कुद ठाननें की है कमीं, वो कमजोर नहीं कुछ सम्भालनें के लिये।
राह होगी हजार तेरे दर की ओंर जाने के लिये असमंजस में हुँ मैं ।
जब होगी तेंरी कृपा बेधडक चल पड़ेंगे हम बिना कीसी की परवाह कीयें।
लाखों बार हमनें हालात से सौदा किया होगा, बिन जाने परिणाम।
अब तो कभी ना करेंगे, जब से तूझे देखा है दिल में अपने ।
फरियाद पहलें हमनें कई बार किया, तुझसे कुछ कर गुजरनें के लिये।
अब तो सिर्फ यादें होगी खट्टी – मिठ्ठी, तूझे रिझानें के लिये ।
आगाह तूने कई बार किया, हमें हमारे घोर कर्मों से दूर रहनें के लिये।
बांध लुंगा मैं तूझे अपने से इतना, भांन ना होगा मुझे कुछ करनें का।
हम बस यहीं चाहते है, कूछ ना हो हमारा इस जीवन में अपना होनें का।
जो कुछ भी रहे वो तेरां, तेरे सिवाय कुछ ना हो हमारा ना ही हमहीं।


- डॉ.संतोष सिंह