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Hymn No. 580 | Date: 10-Jan-1999
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ऐं। मेरे प्रभु कहाँ हो जाती है, हमशे गलती।
ऐं। मेरे प्रभु कहाँ हो जाती है, हमशे गलती।
पहुंचते – पहुंचतें तेरे द्वारें कहीं और क्यों जातें है पहुंच।
मन में भेंद क्यों है उभरता, कीस बात को लेकें है डर जाता।
दिल तो तूझें है चाहता, फिर क्यों भटक जातें है ।
आहत मन को राहत कब मिलेंगी, कब खिलेंगा प्यार का फूल।
उसमें भूल जानां चाहता हूँ, अपनी हर भूल कों।
दिल तलाशता है तूझें इंसाननों के बीच न जाने कब से।
मिलकें भी संतोष ना होता है, उसे मिलन चाहीयें सदा कें लिये।
मत ठग हमारें दिल को अपनीं प्यार भरीं बातों से ।
कायल हो चुका हूँ अपने दिल का, जो तेरे बिना मानता नहीं ।
- डॉ.संतोष सिंह
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हर जख्म को सह लेंगे इस तन पे, दिल ना सह पायेंगा कुछ भी।
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