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Hymn No. 590 | Date: 13-Jan-1999
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हर एक को एक है, प्रभु के पास जाने का, प्रभु को पानें का।
हर एक को एक है, प्रभु के पास जाने का, प्रभु को पानें का।
वहाँ कोई नहीं विशेष है, उसके लिये तो सब एक है।
सान्निध्य पानें के लिये उसका, छोडना पड़ता है अपनापन का।
बनकें उसका जीवन जीना पड़ता है मुताबिक उसके।
त्यागना पड़ता है उसपे लिये सब कुछ, त्याग का अहं न आयें मन में।
हर दिन दिल से सजाकें उपहार देना पड़ता है कोई ना कोई।
इसको मान देनें के लिये सबको मान – सम्मान है देना पड़ता।
परोपकार बिना जाने करना पड़ता है परोपकार।
वो स्वीकारता है तुम्हारे भूलों की सजा बिना बतायें।
प्रार्थना है अगर सच्ची, त्याग कें हर मोह को।
कोई ना भेद करता है वो, सबकें लिये द्वार खुलें है उसकें।
अच्छा हो या बुरा स्वीकारा सबको सदा, पश्चाताप के आँसू बहायें जिसनें ।
हर धर्म से उपर, बाहर या भीतर कीसी भी प्रार्थना स्थल कें ।
सब जगह वो रहता है एकसा, पुकारना पड़ता है विश्वास से उसको।
निष्ठूर ना कहना कभी उसको, भक्तों के पीछें दौड है कई बार।
मालीक है तीनों लोक का, हक् ना जताया उसनें कभी कीसी पे ।
बांधा ना कीसी को, हर इक् को हक दिया जीवन जीने का मुताबिक उसपे।
प्यार तो उसनें सदा से किया है हम सबको।
हम हीं न जान पायें उसके शाश्वत प्यार को।
वक्त रहतें हो जाना है उसका हम सबको, कृपा रहेगी सदा हमपे।


- डॉ.संतोष सिंह