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Hymn No. 597 | Date: 14-Jan-1999
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कसमें खायीं है मैंने कई बार तेंरी, हर बार तोड़ा है इसे ।
कसमें खायीं है मैंने कई बार तेंरी, हर बार तोड़ा है इसे ।
सदा रहना चाहा पास में तेरे, करम बैरी बनतें गये मेरे ।
सनम तूनं किया मुझपे रहम सदा, अदा कर नहीं सकता कीमत उसकी।
फिदा हो जाना चाहते है तेरी इस अदा पे, जुदा कर दें मुझें मेरे तन – मन से ।
कई बार जीया जीवन मर – मरकें, इस बार मर जाने दें मुझे तुझपे।
ना मुझे रहना है शाश्वत, सिमट जाना चाहता हूँ मैं तुझमें ।
लायकीयत ना है कुछ मेंरी, सारा जीवन भरा पड़ा है नालायकीयत से।
मेरे लायकीयत और ना को तू मिटा दें, अपना बन जाने देनें के लिये।
प्यार से प्यार का प्यार पानें के लिये, जीवन में परे साथ पानें के लिये।
- डॉ.संतोष सिंह
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कैसा है तू वालम मेरा, जिसे पुकारना पड़ता है आनें के लिये।
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बयाँ क्या करूं मैं हालत अपनीं, इस कदर ना छोडा मोहब्बत नें बयां कर संकू हालत अपनीं।
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