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Hymn No. 598 | Date: 14-Jan-1999
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बयाँ क्या करूं मैं हालत अपनीं, इस कदर ना छोडा मोहब्बत नें बयां कर संकू हालत अपनीं।
बयाँ क्या करूं मैं हालत अपनीं, इस कदर ना छोडा मोहब्बत नें बयां कर संकू हालत अपनीं।
जहालत दुनिया भर की हमनें उठायी, तेरी मोहब्बत पानें के लिये सब कुछ लुटाते चलें गये ।
गम में ना है हमें हाथ मे कुछ आने का, साथ मिल जाये तेरा, घडा rदो घड़ी के लिये तसव्वूर मन को हो जायेगा।
ना सुनता है तू मेरा कोई बात नहीं, सुन ले तू दिल की आवाज जो धडकती है तेरा नाम लेतें हुये।
जश्न मैंने कई बार मनाया अपने बरबादी का, आखरी जश्न मनाना हूँ चाहता मोहब्बत पे हाथों सजा पानें का।
- डॉ.संतोष सिंह
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कसमें खायीं है मैंने कई बार तेंरी, हर बार तोड़ा है इसे ।
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खो गये होते अब तक कब कें इस भीड में, शरण दें दिया तूने चरणों में अपने ।
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