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Hymn No. 599 | Date: 14-Jan-1999
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खो गये होते अब तक कब कें इस भीड में, शरण दें दिया तूने चरणों में अपने ।
खो गये होते अब तक कब कें इस भीड में, शरण दें दिया तूने चरणों में अपने ।
लायक ना थें कीसी काम कें, ठुकरायें गये थें हर दर से तेरी कृपा हुयीं जो खुदको पहचान लिया।
कर ना सकता हूँ मैं बखान तेरा, हम तो रसपान करना चाहते है डूबके तुझमें ।
गोता लगाया था अब तक उपर ही उपर, नाम लेतें हुये तेंरा, गोता लगाना सीखा हमनें अपने भीतर।
लिखा – लिखीं हुयीं बहुत कुछ पढ रखा था, नजर कें सामनें घटनें लग गया सब कूछ मुलाकात होते ही तुझसे ।
बयॉं ना करना चाहता हूँ हर कीस्सा में अनुभव की बात है, घटता है जो कीसी सद्गुरू के आशीष।
सडक कें पत्थर को ठोकर मिल जाये उसके पैरों की, मालीक बन बैठता है वो सारें जहॉं का।
नाचीज कोई नई हिमाकत ना है करना चाहता, उसे तो साप चाहीयें तेंरा आजीवन पर्यंत।
अहसास बहुत कुछ हुआ है दिल को, तसव्वूर अब तक ना हुआं है मन को तेरा होनें का।
मैं अपने मन की हर बात हूँ काँटता भलें ही कूछ नहीं मैं जानता तेरे सिवाय कीसी को नहीं मैं मानता।
- डॉ.संतोष सिंह
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