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Hymn No. 600 | Date: 14-Jan-1999
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जीवन का हर तिलीस्म टूटता नजर आता है यथार्थ में ।
जीवन का हर तिलीस्म टूटता नजर आता है यथार्थ में ।
दुनिया का हर शख्य झुकता नजर आता है तेरे सामनें।
जिस जीवन को जीवन जान था वो तो खाब निकला।
मौत से डर लगता था मुझको, मौत के बाद जीवन पाया।
सत्य को देखा था कई बार, पर सत्य को सत्य से जुदा पाया।
ऐं।़।़ खुदा नींद से जागा तो, तेरे चरणों में मैंने खुद को पाया।
हसीन गर कोई है इस जहाँ में, वो तो इक् दिल बिचारा।
दिल से जिसनें देखां कीसीको, उसको उतना ही हंसी पाया।
खत्म कुछ नहीं होता है पिता रूप बदलता रहता है ।
पहचान दिल के आखों से होती है, बाकी तो सब अंधकार मय है ।
- डॉ.संतोष सिंह
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खो गये होते अब तक कब कें इस भीड में, शरण दें दिया तूने चरणों में अपने ।
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जब डूब जाता हूँ तुझमें, खूद को करीब पाता हूँ तेरे ।
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