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Hymn No. 601 | Date: 15-Jan-1999
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जब डूब जाता हूँ तुझमें, खूद को करीब पाता हूँ तेरे ।
जब डूब जाता हूँ तुझमें, खूद को करीब पाता हूँ तेरे ।

सताता है हमकों हमारा मन, दूर कहीं खींच ले जाता है तुझसे ।

दिल कहीं भीतर से पुकारता तुझको, मन का संग उसे नहीं भाता।

नजरें ढुंडती रहती है हर जगह, वहीं तू तो मिल जायेगा जरूर।

बुध्दि नकारें इस अनहोनीं को, माननें को तैयार नहीं है दिल मेरा।

धैर्य ना चुका है मेंरा, मैं तो दिल के हाथों मजबूर हो चला है।

पास तू मेरे नहीं आता, कोई रंज ना है मुझें।

खाँबो में आना तू ना छोडना, नहीं तो शिकायत हो जायेगी जीवन से।

तरसते है दिल मेरा तेरे लिये मन फडफडाता है पास आनें को तेरे ।

टूट जाता है कूछ मेरे भीतर टूटनें देंना, साथ तू ना छोडना कभी ।


- डॉ.संतोष सिंह