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Hymn No. 602 | Date: 15-Jan-1999
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हो जाये गर कोई चुक हमशें, जों तू चाहें वो सजा दे देंना।
हो जाये गर कोई चुक हमशें, जों तू चाहें वो सजा दे देंना।
दूर ना होना हमशें कभी, सह लूंगा सजा, सह ना पाऊँगा मैं तेरी जुदाई ।
मैं नहीं जानता खुदा क्या होता है, तडपता है कौंन कीसकें लिये।
जिस्म और रुह साथ हो कें भी साथ क्यों दौड जातें है एक दुजे का।
मिलता है यहाँ सब कुछ, फिर भी छोड जान पड़ता है सब कूछ ।
यें आनें – जाने का चक्कर समझ में कुछ न आता, हाँ उलझा जाता है जरूर।
रहबर में तूझें मानता हूँ तेरे रहमों करम से कूछ – कूछ समझ आ रहा है।
बंद दरवाजें खुलतें नजर आ रहे है जीवन कें रहस्यों को धीरे – धीरें समझता जा रहा हूँ।
जिनको सोचा था वे दूर होगे हमशें, उनकों करीब पाया अपने ।
मेंरी हर बात गलत निकली, खुदा को शाश्वत सत्य पाया।


- डॉ.संतोष सिंह