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Hymn No. 605 | Date: 15-Jan-1999
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ऐं। मेरे प्रभु, प्यार कर लेनें दें जी भरपे तूझे बेकरार मेरे दिल को।
ऐं।मेरे प्रभु, प्यार कर लेनें दें जी भरपे तूझे बेकरार मेरे दिल को।
सतायेगा रात – दिन मुझें चैन ना लेनें देगा पल भर के लिये ।
होश में खुद ना रहता है, हाल बूरा मेरा करता है ।
दीवानगी के आलम में हर शख्स को तूझे समझ बैठता है ।
तूझे ढुंडते हुये खाक छानता फिरता है, हर उनके विरानें महलों में ।
समझ में कुछ नहीं आता उसे, तेरे धुन में धुनीं जमायें बैठता है ।
मजा सब लेतें है उसकी, उसको कुछ समझ नहीं आता ।
खाँबो – ख्यालों में भटकता फिरता मारा – मारा यहाँ से वहाँ ।
तेरी क्या रजा है सजा जो तूने दें रखीं है इतनी लंबी।
इस सजा को सौगात समझा है तेरा, दिल ने उसे दिल से कबूल किया।


- डॉ.संतोष सिंह