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Hymn No. 610 | Date: 17-Jan-1999
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ना मैं कीसी को कुछ कहूँ रें राधेय, जिसनें उंगली पकड लीं तेरी ।
ना मैं कीसी को कुछ कहूँ रें राधेय, जिसनें उंगली पकड लीं तेरी ।
उसको जीवन सुधर गयों रें, कभी हम भी भटकें थें इन्हीं गलीयों में ।
तूने ही तो ठीकानें लगायों हमें, राधेयं कैसे कुछ कहूँ मैं ।
प्यार करें कोई तुझसे, यार बन जाये तू उसको, अहसास ना होनें देना ।
क्या करता वो खोया रहता तुझमें, कर्ता - धर्ता बन जाता तू उसको, राधेय...
तोरें मुताबिक संसार है सरकता, जिसनें लियों तेरे द्वारें शरण ।
उसकें जीवन का हर पन्नां तू ही तो रंगाता, अपना बना के राधेंय ...
पल – पल गुजरता रंग में रंगके तोरे, भेद नजर न आयें उसको कीसीमे ।
राधेय इतना खोया रहता तुझमें, फिकर ना करता कीसीको राधेय...
संसार में रहके संग धरा तेरों, जिसनें ना कुछ सुनीं अपने मन की ।
गायों गीत उसनें दिल से अपने, रमा लियों खुदको तुझमें राधेय्...
- डॉ.संतोष सिंह
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हो लेगें हम खुश तुझमें दे या ना दें तू कुछ हमें ।
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