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Hymn No. 611 | Date: 17-Jan-1999
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राधेय, राधेय, राधेय़... पुकारता हूं दिल से तूझें, करीब आनें के लिये तेरे ।
राधेय, राधेय, राधेय़... पुकारता हूं दिल से तूझें, करीब आनें के लिये तेरे ।
मैं धनीं बन जाऊँ इस जग का सबसे बडा जो नाम धन कमाँ लूं तेंरा ।
रहूँ कहीं भी मैं रम जाऊँ जो तुझमें, उससे बडा कौंन सा सुख पाऊँगा।
जीवन जीनें के लिये नहीं आया हूँ इस तन में, मैं तो तेरे दर पे मरने आया हूँ ।
ना देंना कभी तू मुझे कुछ ऐसा, जिसमें बू आयें मैं – मैं की।
सताया है सबका कोई ना है दुःख, अलापता फिरता हूँ तेरा नाम ।
ना है मुझें अपनी कथनीं, करनी करना मिल जाये करने तेरी सेवा ।
समझाता फिरू सभी के, समझा ना पाउ@ंढ दिल को, जो तडपता है तेरे लिये।
तू कुछ कर दें ऐसा दरद जमानें भर का पा जाऊँ, जो याद दिला जाये तेरी मुझे।
बहुत किया परेशा तूझे ना करूंगा, अब जो तू मुझे अपना लें ।


- डॉ.संतोष सिंह