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Hymn No. 620 | Date: 18-Jan-1999
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ओं मेरे महबुब तेरे कीतनें है रूप बता दें तू मुझे ।
ओं मेरे महबुब तेरे कीतनें है रूप बता दें तू मुझे ।
छलता है तू हमें नित्य नयें – नयें रूप बनाकें सदा से ।
तेंरी इसी अदा पे होश कीतनों ने खोया, खुद को भुलाकें ।
करता है तो ठीक है, पर क्यों हमारें दिलों को तू है छलता।
नांच – नंचाता है तू हमें, अपने पास बुलाकें, मस्ता जातें है हम।
सताता तू है हमें, अपने से दूर करकें क्यों देता है सजा।
विरह के गीत गाते है हम बिछोह में तेरे, पास आनें के लिये।
नीर बह निकलते है आँखों से हमारें, याद करकें तूझें ।
फिर भी तू ना पसीजें, तू ही बता कैसे मनायें हम तूझें ।
बांध लेना चाहता हूँ मैं तूझे, अपने अटूट बंधन में ।


- डॉ.संतोष सिंह