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Hymn No. 621 | Date: 19-Jan-1999
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विचलीत कर जाता है हमको मन हमारा, रोड़े और कोई ना है डालता।
विचलीत कर जाता है हमको मन हमारा, रोड़े और कोई ना है डालता।
सालती है दिल को यें बातें जब अपनीं कथनीं – करनीं मे है फर्क पाता ।
जबानीं बहुत कुछ कहता हुँ मैं तुझसे, अब करकें दिखाना चाहता हूँ ।
लौटानें को तैयार हूँ अपने शब्दों को, तेरे वचनों पे कायम रहनें के लिये।
बहुत कुछ कर गुजरनें को हूँ तैयार मैं, अंजाम की परवाह कीये बगैर ।
जीवन के उन राहो से गुजरेंगे हम जरूर, जो जात है तेरे दर की ओंर ।
फिकर ना है मुझें अपनी जो कदम आज उठें है तेरे ओर वो ना रूकें कभी।
प्रिय तुझसे हर बात हमनें कहीं है, चाहें जबानीं या दिल में ।
मुश्किल में बहुत बार डाला है तूझे, तेरी हर मुश्किल सौंप दें तू मुझें ।
पलक झपकतें हवा हो जाउँगा न जाने कीतनें जनमों तक, एक क्षण को तूझे सम्भाल न पाऊंगा।
होगी जो कृपा तेंरी हमपे वो सब कुछ कर गुजर जायेगे पलक झपकतें ।
- डॉ.संतोष सिंह
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