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My Divine Blessing
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Hymn No. 623 | Date: 19-Jan-1999
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एक अंतहीन कहानीं का अंत नजर आ रहा है ।
एक अंतहीन कहानीं का अंत नजर आ रहा है ।
मंजिल जो दूर थी उसका छोर नजर आ रहा है ।
चलतें हुये सदियों बीत गयीं, दूरियाँ ज्यों की त्यों बनी रहीं ।
करीब जब उसनें बुलाया, सिमट गयी सारी दूरियाँ ।
हिचक था मन में, हर दिल डरता था चलनें से ।
उँगली जो उसकी पकड़ी काफूर हो गया सब कूछ मेरा ।
दिल ने सुन रखा था उसकें बारें में, छबी थी खांबों में ।
देखनें सुनने का मौका अब मिलनें लगा।
अच्छा कुछ ना लगता था, अपने से दूर रहता था।
जो पास उसके पहुचें, आनंदमय हो गया सबकूछ ।
आश्चर्यमय कूछ ना है, सोनें से खरा है ।
सत्य से डरा था मैं, तेरे पास आकें हर डर निकल गया।
कुछ सुझता न था हमाके, कुछ का कुछ करते थें ।
तेरे पास जो आ गये सरूर हमपे छा गया तेंरा
मेरे मालीक क्यों दी तूने हमें इतनी लंबी छुट्टी
कुछ – कुछ समझ आ गया बाकी तू समझा देंना
मुझे अब क्या चाहीयें, पता करकें अब क्या करना ।
पास तेरे जो आ गया, मैं सब कूछ पा गया ।
- डॉ.संतोष सिंह
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क्याँ माँगु मैं तुझसे, बिन् कहें दें रहा है सब कुछ तू मुझें ।
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