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Hymn No. 624 | Date: 19-Jan-1999
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कहनाँ बहुत कुछ चाहता हूँ तुझसे, समझ नहीं पाता शुरू कहाँ से करें ।
कहनाँ बहुत कुछ चाहता हूँ तुझसे, समझ नहीं पाता शुरू कहाँ से करें ।
जी बहुत है करता मिलनें को तुझसे, पता नहीं मन क्यों है डर जाता ।
सुबह बहुत बार हुयीं जीवन में मेरे, कब रोशन होगा दिल हमारा ।
घबरा जाता हूँ, युं हीं बैठें – बैठें, ऐंसी कौन सी बात है जो डराती है हमें ।
आंख का मिचौली का सिलसिला, तेरे – मेरे बीच शुरू हुआ था कब और क्यों ।
बिना कसम दियें तूझें कैसे बांधपायेंगे, अपने प्यार में तू यें बता दें ।
जीवन बहुत बार जीया है हमनें, जीवन का सार समझ ना पायें अब तक ।
तलब क्यों लग जात है माया की, सुखद अवस्था में पातें है तेरे संग रहनें पे ।
पुजा हर रोज करते है तेरी, अब तक पूज न पायें है तूझे ।
झुठा हूंगा लाख मैं, सिर्फ तुझसे मैं सच्ची – सच्ची बात हूँ करता ।
- डॉ.संतोष सिंह
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