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Hymn No. 643 | Date: 23-Jan-1999
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युध्द चल रहा है हमारे मन के भीतर न जाने कीतनें कालों से ।
युध्द चल रहा है हमारे मन के भीतर न जाने कीतनें कालों से ।
हम भी हम नहीं, न जाने कीतनें जिस्म कटकें गिरतें रहे हम लडते रहे ।
कोई पल ना बीता जब रूका हो युध्द, जुझतें रहे सदा, विराम न किया कभी।
तन पे तन बदलतें गये, मन वहीं का वहीं रहा, अशांत मन ने अशांत जीवन को किया ।
सुख तन को पहुँचा, दुखी तन – मन हुआ, इसकें भीतर कभी अपना ना ख्याल किया।
ऐसा ना है बदलनें का मौका हाथ आया न हो, मन में कभी स्वीकार ना किया।
अब ठांन लीया है हमनें मन की ना करेंगे परवाह, हार हो या जीत बातों में न आयेंगे ।
तेरे सामनें बैठकें हर पल गीत तेरा गायेंगे, तुझको हम प्यार से मनायेंगे ।
हर बार तूने जगाया हमें, हमनें ही ना तूझपे ध्यान दिया, भोगों में लिप्त थें इतने।
जीवन दीया हुआ तेंरा है, तेरे बतायें हुये करमों को दिल से कभी न अंजाम दिया।
सुलह – सफाई में कहना ना हूँ कुछ चाहता, मैं तो तेरे दर पे आना हुँ चाहता ।
अधुरें जीवन को पूर्णता मिलेंगी तुझसे मिलकें, बिछुड़ें हुये दिल को दिलदार मिलेंगा।


- डॉ.संतोष सिंह