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Hymn No. 645 | Date: 23-Jan-1999
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उलझा मत तू मुझें इतना, उलझ जाऊँ दुनिया की बेगानी गलीयों में ।
उलझा मत तू मुझें इतना, उलझ जाऊँ दुनिया की बेगानी गलीयों में ।
दिल मेंरा लगता नहीं कहीं, हर बार भटक कें पहुँच जाता है करीब तेरे ।
बेशर्म हो चुका हूँ इतना साथ रहता हूँ कीसीकें, पहुंच जाता हूँ करीब तेरे ।
मुझे ध्यान ना है कीसीका तेरे प्यार में भूला देना चाहता हूँ खुदको ।
बहुत आबाद हो लीया तेरे प्यार में, अपनीं बरबादी देखनां हूँ चाहता ।
पलटतें हुये हमनें सब कुछ देखा, कीस्मत पलटतें हुये आज देखा ।
चाह कें भी कोई साथ निभा ना पाया, तूझें हर आवाज पे साथ पाया ।
ओरों की दगा से हम ना हुये खफा, तेरा साथ हमनें सदा से पाया ।
दिल से कहूँ तो मजबूर हो चुका हूँ तेरे लिये, दिन गुजरतें हुये हूँ देखता ।
मैं अपनीं पहचान खों देना चाहता हूँ तेरी पहचान में ।
- डॉ.संतोष सिंह
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