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Hymn No. 646 | Date: 23-Jan-1999
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बहुत कुछ है ऐंसा जो हम सबनें है देखा ।
बहुत कुछ है ऐंसा जो हम सबनें है देखा ।
कली को फूल बनतें, सुबह को सांझ में ढलते देखा ।
शून्य से दस, दस को सौ, सौ को शून्य में सिमटतें देखा ।
जो हाथ में आया था, उसे हाथ से फिसलतें देखा ।
शुरवीर हो या बुध्दिमान, सुंदरता की खांन को मिटतें देखा ।
हर पल कुछ नया पाया, पुरानें को मिटतें देखा ।
छोटा हो या बडा, हंसते हुये को रोतें पाया ।
देखतें – देखतें हर इक् की छाप को चित्त पे पाया ।
कई बार अपने –आपकों चिन्ता में जलतें पाया ।
न जाने कीतनें जनम् लिये, फिर भी कूछ हाथ न आया ।
साथ निभानें चला खुदा का, खुद को मिटतें हुये पाया ।
करम के पहियें में कर्ता - भोक्ता को कुचलतें देखा ।
सहम गया दिल मेरा, कैसे गाऊँ प्यार का तराना ।
हर बार अपने आपको पैदा होतें देख बहुत पछताया ।
दिल भर गया है इस खेल में, डर लगता है सबसे ।
मुझें ना सुख चाहीयें ना दुःख, कूछ ना बनाकें तू छोड दें ।


- डॉ.संतोष सिंह