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Hymn No. 647 | Date: 23-Jan-1999
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क्यों प्रभु फिर वहीं ज्वार – भाटें की कहानी है तू दोहरा रहा ।
क्यों प्रभु फिर वहीं ज्वार – भाटें की कहानी है तू दोहरा रहा ।
हम तो खेंल खेलतें है खुदशें, तू भी कम नहीं मौका पाके खेलता हौ हमशे ।
अंशान की है हम खान कई जनमों से, तू चला ज्ञान का पढानें ।
निर्मल प्रेम को क्या जाने, भोग की दुनिया में फिरतें रहते है हर पल ।
अनछुआ ना है कोई हिस्सा, परिपक्व हो चुका है जमानें के संग रहके ।
दोष ना तेंरा है ना ही उनका, ना मेरा कोई तो चाहीयें करमों का भार उठानें के लिये ।
तूने दिया है सदा कूछ ना कूछ हमें, हाथ पसारनें की आदत जो लग गयी हमें ।
अब जब करनें की नौबत आयी, तो दुनिया का रोना शुरू कर दिया ।
सदियों से आदत लगी है इच्छाओं की, कैसे पार पायेंगे इन सबसे ।
फटनें से दामन को कैसे बचा पायेंगे, जब कांटों का अंबार लगा हो।
प्रभु मैं तूझे दगा देनां नहीं चाहता, हकदार बना दें मुझे कीसी नयीं सजा का।
उलट के सुलट जाऊँगा इस जीवन से, दागदार ना होने दूंगा तेरे नाम को ।


- डॉ.संतोष सिंह