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Hymn No. 655 | Date: 26-Jan-1999
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कहीं सुनी तुझसे बहुत कहीं, अब तू मुझें तेरी सुना ।
कहीं सुनी तुझसे बहुत कहीं, अब तू मुझें तेरी सुना ।
खुदाई छोडकें तेंरी, प्यार कर लें तू हमशें हयां बनकें ।
मेरी बक – बक पड़ेगी सुननीं तूझे तब तक, जब तक ना कहेंगा तू कुछ हमें ।
तूने जो दिल के भीतर कहा, आधा अधुरा सुनकें मैंने तुझसे कहाँ।
मेरा मैं लगनें से ना होता है मेरा, वो तो सदा से है तेरा ।
रुआसा हुआ हूँ कई बार मैं, मैं बनकें कोई कार्य करता हूँ जब ।
उसकी आँच लगतें ही पुकार उठता हूँ है दिल मेंरा तूझे ।
तू शरण में लें लेंता हमें, मैं – मैं को भुलापे बन जाता हूँ तेरा ।
शल – पोसकें तूने बडा किया हमें अपने आंगन में ।
पता नहीं क्यों रह – रहके भूल जातें है तूझें माया के बगिया में ।
छाया न पड़नें देना तू हमपे कीसी और की, साथ लें लेंना तू हमें अपने ।
सब कूछ तू छीन लेना मेरा अपना, तू ना छीनना तेरा प्यार हमशे ।


- डॉ.संतोष सिंह