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Hymn No. 657 | Date: 26-Jan-1999
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परवाह कीस – कीसकी करूँ मैं, परवाह प्यार में रोड़े डालें सदा ।
परवाह कीस – कीसकी करूँ मैं, परवाह प्यार में रोड़े डालें सदा ।
इच्छायें जन्मती रहती है हर पल, होम करती रहती है हमको ।
नशा छाया रहता है मोह का, जागनें ना देती है हमें ।
छुटनें को ना छुटती है कभी कोई आदत, स्व के भाव को जातें है भूल ।
आतें है कुछ औंर के लिये, करतें है कुछ औंर,
जोर लगातें नहीं अपने आप पे, कहीं औरं है लगातें ।
भटकें हुये है हम सदा से, स्वीकार सच्चें दिल से करतें नहीं ।
औरों की तो छोडाs फुरसत नहीं पातें अपने आप के लिये ।
न जाने कीतने जन्मों से ये क्रम्र दोहरातें चलतें है, फिर भी समझ नहीं पातें ।


- डॉ.संतोष सिंह