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Hymn No. 663 | Date: 28-Jan-1999
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हमें बहोत कुछ मालुम है, फिर भी कूछ नहीं मालूम ।
हमें बहोत कुछ मालुम है, फिर भी कूछ नहीं मालूम ।
दिल तेरां हो चुका है जो पहचानता है तेरे गीतों को ।
आवाज – आवाज में है फर्क, जैसे नजर – नजर का भेद होता है ।
हम एक बार को धोखा खा जाये, दिल सब कूछ जान लेता है ।
मगरूर रहतें है हम जो उसकी बातों को नहीं मानतें ।
तेरे करीब आतें – आतें, खुद को धोखा दें बैठतें है ।
एकरार बहोत बार किया, तेरे प्यार का दिल में।
न जाने क्यें हर बार फेल हुआ तेरे इम्तहाँ में ।
पास होनें की परवाह ना है, तेरे गीतां को बसा लूं दिल में ।
मन मेरा हो जाये तेंरा, तन के कर्मों की परवाह ना है तूझें ।
आवाज देतां रहूंगा बिन जाने तूने सुना या ना सुना ।
तेंरी मौन को ही समझकें, प्यार में तुझसे करता रहूंगा ।
- डॉ.संतोष सिंह
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