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Hymn No. 664 | Date: 28-Jan-1999
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मगन हूँ मैं तेरे आंगन में, लग गयीं जो मुझको तेंरी लगन।
मगन हूँ मैं तेरे आंगन में, लग गयीं जो मुझको तेंरी लगन।
अगन मेरे प्यार की भडक गयीं, होमं हो जाऊँगा मैं उसमें ।
मुझें ना बचना है, बचकें हर बार वहीं पुराना रोना है ।
इस पल का इंतजार सदीयों से किया था, कीस्मत नें आज साथ दिया ।
पल भर का देर ना करेंगे, तेरे आगोश में आनें के लिये ।
श्वासों का खेल बहुत है खेंला, अब तेरे प्यार का खेल है खेलना ।
जतन नहीं है कहीं मन में, यें तो प्यार की सीत्कार है।
दर्द का बोध कहॉं है, चारों और प्यार की पुकार है ।
आकार लेगा मेरा हर इक् सपना, जो लेकें देखा था तुझको ।
नाकार ना सकेंगा तू भी, साकार होनां पड़ेगा तुझको भी ।


- डॉ.संतोष सिंह