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Hymn No. 668 | Date: 28-Jan-1999
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पार न पाना है हमें कीसी से, रहना है हमकों तो ईश्वर के चरणों में ।
पार न पाना है हमें कीसी से, रहना है हमकों तो ईश्वर के चरणों में ।
भरण – पोषण के फेर में ना है पड़ना, रहना है हमें तो गातें गीत उसका।
मर्जी कें आगें उसकें चलती नहीं कीसीकी, मनमानीं बहुतों ने की चली नहीं कीसीको ।
प्यार किया जिसनें उसको, बिन कहें हर बात मानीं उसनें उसकी।
अहसास उसका सुखद है, उसकें बिना जीवन का हर पल दुखदायी है ।
हमारें भीतर है छुपा हुआ, ढुंड़ें उसे सदा बर्हिजगत में हम जान न पायें ।
पानें के लिये उसे दिल की इक् सच्ची आवाज की है जरूरत, ना ही रट् लगानें की ।
असीम ताकत का मालीक बनाया है उसनें, अपने आपकों आकार में ढाला है हमारें रूपों में ।
दिल दें दें इक् बार उसको, दौडा चला आयेंगा अपनीं खुदाई भुला कें ।
देखकें उसको भूलेंगा तू तन कें बंधन को, शरण लें लेंगा चरणों में उसकें अलग ना होनें के लिये।


- डॉ.संतोष सिंह