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Hymn No. 671 | Date: 29-Jan-1999
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मैं कुछुआ बनकें चल पड़ा धीरें – धीरें तेरी ओर ।
मैं कुछुआ बनकें चल पड़ा धीरें – धीरें तेरी ओर ।
मेरी गती है सबसे धीमो, कहीं कीसी के सामनें ना कोई बिसात ।
फसाद नया करनें से हूँ ठरता, मैं तो अपनी राह पे धीरे – धीरे हूँ चलता ।
तेंरी ओंर जातें हुये लोगों को प्रणाम करकें, चुपचाप पद्चिन्हों पे हूँ उनकें चलता ।
मेंरी कहॉं कोई ताकत थी, इतनें सारें लोगों को देखकें हौसला कर बैठा ।
प्यार से मेरा स्वागत हुआ, पस्त होनें पे बंधाया हिम्मत ।
प्रभु क्या भाग्य दिया तूने मुझें, कैसे शुक्रियाँ अदा करूं तेंरी ।
लोगों को राह बतानें वाले ना है मिलतें, यहाँ तो उंगली पकड के राह है दिखातें ।
कभी कीसी नें ना मेंरी चाल पे टोका, हाँ तेरे बारें में बहुत समझाया ।
प्यार भरी निगाहो से प्यार जो मुझपे बरसाया, मैं प्यार से तेंरी ओंर चल दीया ।


- डॉ.संतोष सिंह