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Hymn No. 673 | Date: 30-Jan-1999
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प्रभु इस धरा पे आनें के लिये कीतनें रूप धरतें हो ।
प्रभु इस धरा पे आनें के लिये कीतनें रूप धरतें हो ।
कभी माता – पिता बनके, ज्ञान देनें के लिये गुरू रूप में आतें है ।
निभाया है साथ तूने कीतनी बार बंधु बनकें, सखा तूमसे प्यार कौन हो सकता ।
बेहतर तूमसे कोई नहीं, संसार का हर रूप तूम्हीं तो धरतें हो ।
अज्ञान का स्वरूप हम है ज्ञानमय तू, प्रेम को न जान था कभी मैंने ।
आकें तेरे करीब बंध गये प्रेम के बंधन में ।
स्वीकार करता है दिल मेरा, प्रेम के झरोखों से देखता है तूझें ।
मेरा मैं बदल गया तेरा सान्निध्य पाकें जीतें जी तर गया ।
तेरे दर पे आ गया जो मैं स्वर्ग में पहुँच गया ।
लंगोट त्यागते थे है जिसकें लिये वो तो मेरा हमदम बन गया ।


- डॉ.संतोष सिंह