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Hymn No. 674 | Date: 30-Jan-1999
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आवाज दी थीं बहुत, पास बुलाया तूने न सोचा था हमनें कभी ।
आवाज दी थीं बहुत, पास बुलाया तूने न सोचा था हमनें कभी ।
जो कीताबों में पढ सुन रखा था लोगों से, वो आँखों देखा हाल हुआ ।
प्रभु कयास दिल नें कई बार लगाया तू कैसा होगा ।
मिलकें जान तू सबसे अनोखा मदमस्त, दिलों को हरनेवाला छलिया निकला ।
तूझें वो सब करतें हुये पाया, चुपचाप जीवन के हर धर्म को निभातें हुये देंखा।
तेरे पास आकें असली – नकली का भेद जाना, धर्म के हर अर्ध को बदलतें पाया ।
मेरे मौला मेंरी हर धारण टूटीं, तुझको तो मैंने सबसे अलग पाया ।
दुनिया भरकें शोर – शराबों के बीच तुझको चुपचाप पाया ।
हर धर्म के पाखंड से दूर, तूझें दिल की धुनों पे मचलतें पाया ।
जीवन के हर रंग में रंगकें जीतें हुये लोगों को अपने करीब बुलाया ।
सर पटकतें पाया धर्म के ठेकेदारां को, चाह के भी एक सीढी चड न पायें तेरे दर का।
दूर कहीं खेतें में गातें हुये कीसानों ने संगत पायीं तेंरी यु हीं ।
प्रभु मैं पगला गया हूँ, मेरा हर सच झूठ निकला ।
गलत कई बार औंर साबीत होउढँ, प्रभू तू तेरा स्वरूप ज्यों का त्यों रखना ।
- डॉ.संतोष सिंह
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प्रभु इस धरा पे आनें के लिये कीतनें रूप धरतें हो ।
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देख रहा हूँ खुदको प्रभु आईनें में तेरे ।
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