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Hymn No. 675 | Date: 30-Jan-1999
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देख रहा हूँ खुदको प्रभु आईनें में तेरे ।
देख रहा हूँ खुदको प्रभु आईनें में तेरे ।
प्यार पाया तुझसे, उसकी कीमत समझ न पाया।
लम्पटता को छोडना चाहता हूँ घिर जाता हूँ लम्पंट से ।
गुढ हें बहुत सी बातें समझतें हुये गलती कर बैठता हूँ ।
अनोखा है अंदाज तेरा समझानें का, अंजाने दिल में उतर जाती है ।
ढालनें से, बेहतर मानता हूँ खुद को तेरे हवालें कर दूं ।
प्यार तुझसे बहुत हूँ करता, फिर क्यों करूं परवाह कीसीकी।
लोगों की बात ना हूं सुनता, फिर क्यों डर जाता हूं ।
जब सर रख दिया है ओखली में, परिणाम से क्यों डरना ।
हाथ जब पकडा तेंरा, तो कूछ भी क्यो है सोचना।


- डॉ.संतोष सिंह