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Hymn No. 677 | Date: 30-Jan-1999
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छाप पड़ चुकी है हमारें चित्त पे तेंरी, मिटेंगे हम, मिटेंगा ना यें छज्ञप चित्त पे से ।
छाप पड़ चुकी है हमारें चित्त पे तेंरी, मिटेंगे हम, मिटेंगा ना यें छज्ञप चित्त पे से ।
कौंन कहता है की दूर तू है हमशें, रहता होगा तू कहीं भी, पास पाता हूँ तूझें अपने ।
खाँबों की बाल अलग है, खुली आँखों से मुलाकात होनें लगी तूझसें।
तेरे आनें के अहसास से रोम – रोम झुमनें लगता है, दिल में जन्म लेनें लगते है नयें तरानों का।
एक ज्वार सा उठता है तन – मन में, गिरफत में आतें ही तेरे भुल बैठतें है खुदको ।
मालीक बन बैठा हुँ आज मैं बहुत कुछ का मिलतें ही तुझसे, न था कूछ पास मेरे ।
मेरे जैसे अरबों – करोडाsं बैठे थें दर पे तेरे तेरी कृपा से संग मिला तेंरा ।
जो चाहें वो तो बना दें जीवन का हर लम्हाँ तेरा है, ना ही कीसी औंर का।
- डॉ.संतोष सिंह
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