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Hymn No. 679 | Date: 31-Jan-1999
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मस्ती आ जाने लगती है, कदम बडते है जैसे – जैसे तेंरी ओंर ।
मस्ती आ जाने लगती है, कदम बडते है जैसे – जैसे तेंरी ओंर ।
मुश्किल है बयाँ पाना तेरे कीश्ती पे संवार होतें ही न जाने कैसा धुन छा जाता है ।
दिल के मन के संग दौड़े पास तेरे, हम छूट जातें है बहुत पीछे ।
चारों औंर छायीं रहती है खुशीयाँ, जब हम होतें है करीब तेरे,
सच कहता हूँ मन में कोई भाव उठता नहीं पल भर के लिये जब साथ तेरे होतें है ।
खुशीं – खुशीं ना रहती, सुख – सुख से अलग है रहता, मस्ती में विभोर हो उठतें है ।
यूं कह लें एक अजीब से आनंद में का जुनून छाया रहता है हम पे ।
साथ सब कूछ वहीं का वहीं रहता है, भौतिक को मांग बनीं की बनीं रहती है ।
अपने – परायों के बीच हम होके भी ना रहते है, एक अजीब सा संकू रहता है दिल को ।
कूछ कह पाना मूश्किल है, प्रिय की कृपा से ये अनुभूती होती है इक् नहीं कई-गई बार।
- डॉ.संतोष सिंह
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ध्यान की बात ना है करनीं, हमें तो तेरा नाम लेना है प्रतिपल ।
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लाचारी में ना फसंना है, हर पल तेंरी ओर बेडते है रहना।
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