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Hymn No. 70 | Date: 13-Jan-1997
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होने को तो है हम सब, फिर ना होने की उम्मीद कैसी ।
होने को तो है हम सब, फिर ना होने की उम्मीद कैसी ।
बदल के भी ना बदल पायें खुद को, दोष क्यों देना है लोगों को ।
फर्क है अपनी कथनी – करनी में, किस बात की शिकवा ज़माने से ।
जो पाया है वो संचित कर्मों का है खेल, ईश्वर को दोष क्यों देना ।
सौंपा है सब कुछ तेरे हाथों में, क्यों हाथ फैलाये बैठा है जगवालों से ।
- डॉ.संतोष सिंह
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