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Hymn No. 699 | Date: 03-Feb-1999
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प्रभु कीतना अपनापन है तुझमें, कीतना बेगानापन है हममें ।
प्रभु कीतना अपनापन है तुझमें, कीतना बेगानापन है हममें ।
तू रहता है दूर हमशें फिर भी रखता है हर पल ख्याल हमारा ।
आतें है करीब तेरे तेरा होनें के लिये, दुनिया से जुडतें ही भूल जातें है तूझें ।
विचित्र है हमारा कर्मों का संसार, धर्म निभा नहीं पातें प्यार का हम।
सचमुच का कब होगा, जब तू हागा, तेरे सिवाय कोई ना होगा।
हर पल हम तेरे करीब होगे चाहें इस सारें जहाँ में हम कहीं होगे।
स्थिर होनें पर पल भर में मन जुड जाता है तुझसे, अस्थिर होने पर तू हाथ नहीं आता।
दिल तो तेरे करीब रहना चाहें, तुझमें अपना होश गवाना चाहें ।
समझ नहीं आता भेंद कब मिटेंगा हमारें मन का, दोडा चला आऊँ तन की बेड़ीयाँ तोड़के।
सलामती मैं नहीं चाहता, तन – मन का, उड जाये तेरे प्यार में मेरे चीथड़े।


- डॉ.संतोष सिंह