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Hymn No. 701 | Date: 04-Feb-1999
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खेल – खेलतें रहते है जीवन में, हर पल हम नयें – नयें ।
खेल – खेलतें रहते है जीवन में, हर पल हम नयें – नयें ।
खेल न पाया प्रभु के साथ, खेलना हुआ व्यर्थ सब ।
मन का खेल खेला, जीवन में कई बार कईयों के संग ।
तन का खेलं खेला, जीवन में अपनों और परायों के संग ।
हर खेल में खुद को भुला, खेलते हुये बन गये खेल के अंग ।
खेलतें – खेलतें खेंल के चारों खानों में खुद को चित्त पाया ।
हारकें पछताया, जीतनें पे कुछ भी हाथ न आया ।
नियम् जो जान ना हमनें कभी, खेंल खेला खेल में बहकें ।
वो तो तट्स्थ रहके रोल निभाता रेफरी का।
आगाह करता है पर ना रोकता कीसीको, चुपचाप देखता सभी को।
लस्त पस्त हो जातें है तन – मन से, परिणाम देखकें रोना आता ।
देर बहुत कर देतें है, सवेरा होने पे फिर वहीं दोहरातें ।
इस खेल से पार जान होगा आज नहीं तो कल, तट्स्थ बनकें सबको अपनाना होगा।
- डॉ.संतोष सिंह
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