VIEW HYMN

Hymn No. 716 | Date: 07-Feb-1999
Text Size
मजबूर होते है अपने मन से न किसी से ।
मजबूर होते है अपने मन से न किसी से ।
स्वः को पहचानते नहीं, मन की मनमानी में मन लगाते है ।
पुकारते तुझे कई-कई बार, दिल से पुकार पाते नहीं एक बार ।
उलझा लेते है अपने आपको उन राहों में जहाँ जाने की न है जरूरत ।
फितरत अपनी समझ नहीं पाते, सदगुरु के साथ रहके पहचान नहीं पाते ।
धैर्य देखके लज्जा आती है, अपने आपपे नाहक कितना परेशां करते हैं तुझे ।
एक-एक करके सिखाता है वो सब कुछ, कृपा से उसके सिखते चले जाते है हम।
मुक्त वो करता नहीं तनिक, हर अधिकार देता हमारे हाथों में सही राह बताता सदा ।
जालिम हम इतने भी नहीं जब हो कृपा तेरी, बढते चलूँगा तेरी और बिना हिचक।
मन में संदेह न है तेरे प्रति, शंकालु है थोडा, बहुत अपने आप के लिये ।


- डॉ.संतोष सिंह