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Hymn No. 717 | Date: 07-Feb-1999
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शोर मचा है, चारों ओर धरा पे, प्रभु का दावेदार हूँ मैं ।
शोर मचा है, चारों ओर धरा पे, प्रभु का दावेदार हूँ मैं ।
भागती है दुनिया अंधी बनके, हर कोई अपना अनुभव है सुनाता ।
असल को कोई पहचान नहीं पाता, नकल पे अपना दांव लगाता ।
सोच में पड़ जाता हूँ प्रभु मैं, तू कैसा-कैसा खेल है खेलता ।
नियम हमने बहुत देखे है, यहाँ हर नियम को बनते बिगडते हूँ देखता ।
मुझे हैरत न है अपने, कभी हम भी गुजरे थे इस गलियों से ।
पोस रहे है जो आज अपनी इच्छाओं को, कभी हमने पोसा था ।
सोचा न था प्रभु यूं ही मुलाकात हो जायेगी तुझसे ।
तेरे चरणों की धूल बनने का मौका मिल जायेगा हमें युँ ही ।
कहीं कुछ होता है, प्रभु तेरी कृपा से, दोष होके न है दोष किसीका ।
- डॉ.संतोष सिंह
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