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Hymn No. 721 | Date: 08-Feb-1999
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न हमें डाल संख्या के फेरे में, खेल है अबूझ इतना ।
न हमें डाल संख्या के फेरे में, खेल है अबूझ इतना ।
जो एक बार घुसा, फिरता रह गया जीवन में हर क्षण ।
कोई ठौर-ठिकाना न है, कब कहां ले जाके पटकेगा ।
बुरा हाल तो होता है, पर ये बदहाल करके छोड़ता ।
रोब जमा नहीं सकता कोई इसपे, जोर चलता है उसका सबपे ।
जाने-अनजाने हर कोई फँसता है, इसके जाल में ।
मारता न है किसी को, सिसकते हुये मजबूर करता है जीने को ।
सांस लेने का मौका नहीं देता आस बंधाता है सदा ।
इसकी करतूत जगजाहीर है, फिरभी लोग आके है फँसते ।
जानते है सब कुछ आदत से मजबूर होके, साथ इसका खोजते ।


- डॉ.संतोष सिंह