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Hymn No. 736 | Date: 12-Feb-1999
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प्रभु, प्रभु, प्रभु खोज न पाया अपने दिल में तूझको ।
प्रभु, प्रभु, प्रभु खोज न पाया अपने दिल में तूझको ।
खोजने चला इस संसार में, खायी ठोकरें दरबार की तू हाथ न आया ।
गर्व से अकड़ी गर्दन को झुका के न देखा अपने दिल में ।
न जाने कितने मंदिर-मस्जिदों की सीढ़ियाँ चढ़ गये पर तुझे न पाया ।
मन में था कुछ और समाया, कहाँ से होता दीदार तेरा ।
तू तो तैयार था यार बनने के लिये, हम तुझसे प्यार न कर पाये ।
लत ऐसी लगा रखी है छुडाये न छूटती है, वो तो तैयार है जान लेने को ।
हार मानूँगा न कभी फतह के वास्ते, अरमानों को मन से निकाल फेंकूँगा ।
लौटना मेरे वश की बात नहीं, अब तो तो तेरे हाथ में है ।
मुझे न चाहिये किसी का साथ, तेरा दीदार सर झुकाके करुँ दिल में अपने ।
- डॉ.संतोष सिंह
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प्यार में बहे वो क्या नहीं कह लेते हैं तुझको ।
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