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Hymn No. 744 | Date: 14-Feb-1999
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काशी का शिव आया दर पे मेरे, स्वागत करना न जानूं मैं ।
काशी का शिव आया दर पे मेरे, स्वागत करना न जानूं मैं ।
पगलाया मैं इतना, देखके उसको भूला प्रणाम करना ।
वो भोला, मुस्कराते हुये स्नेह भरी आखों से प्यार का जाम पिलाता रहा ।
स्थिर हुआ तन-मन मेरा, पाके उसके सामने हतप्रभ सा खड़ा था ।
डुगडुगी जब उसने बजायी, दिल मचला बोले बोल न फूटा ।
आखें भर आयीं, विस्मृत खड़ा रहा मैं निहारते उसको ।
मुस्कराता खड़ा था वो, न वो बोला, न मैं बोला, न जाने सुध-बुध कहाँ खो गयी थी मेरी
चरण छूने का जब ध्यान आया, झुकके किया प्रणाम उसको ।
सर अपना ज्यों ऊपर उठाया, सामने से उसको ना देख पाया ।
बहुत झल्लाया अपने ऊपर, चरण छूते ही चरण पकड क्यों ना लिया ।
वो साथ जाता, हम भी संग उसके चल देते ।
भस्म बनाके भोला के चरणों को छू लेते ।


- डॉ.संतोष सिंह