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Hymn No. 752 | Date: 15-Feb-1999
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जब सवार हो उसकी किश्ती में, तो फिर मस्ती और मस्ती है ।
जब सवार हो उसकी किश्ती में, तो फिर मस्ती और मस्ती है ।
कुश्ती नहीं करनी जीवन में किसीके संग, रहना है उसकी मस्ती में ।
मन के हर भावों का मुख मोड़ देना है, फिकर छोडके रहना है मस्ती में ।
जिक्र किसी से कुछ करना नहीं, मस्ती तो मस्ती में है रहना ।
डरना क्यों किसीसे जब सवार हो चुके है उसकी किश्ती पे ।
प्यार में जिद थोडी सी हो तो मस्ती का आलम कुछ और होता है ।
हर साथ छुडाके मस्ती में तू हर पल मस्ती करता रहता है ।
मस्ती हो ऐसी किश्ती का जाता रहे भेद भूला मस्ती में ।
बयाँ कर पाना मुश्किल है, मस्ती में शब्दों का ख्याल नहीं आता ।
मस्तीं तो मस्तीं है मौत हो या जीवन ।


- डॉ.संतोष सिंह