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Hymn No. 761 | Date: 17-Feb-1999
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तेरी निगाहों का जाम हम सरेआम पीते रहे ।
तेरी निगाहों का जाम हम सरेआम पीते रहे ।
दिन हो या रात तेरा नाम हरदम लेते रहे ।
बस में नहीं मेरे पास आना तेरे ।
कशिश कुछ ऐसी, है तुझमें, खीच लेती है मुझे ।
परवाह कौन करने, लगा जमाने की ।
जब होश में न है अपने, तो कहाँ किसी से डरना ।
दिवाना तो सरेआम गुमनाम होता है प्यार में ।
यार के सिवाय भान न होता है किसीका ।
दोष कहाँ है मेरा, ये तो तेरे प्यार का है कमाल ।
जो हलाल करता है हमको सरेआम प्यार में ।
दाम देके न मिलता है तेरा प्यार ।
ये तो नजरो का है काम जो, चुपचाप पिलाती है जाम सरेआम ।
होश में रहते हुये मदहोश कर जाती है ।
जो बात लब पे आने से डर लगता है, वो कह जाती है ।
- डॉ.संतोष सिंह
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नजर तेरी है ऐसी जो भुलाये न है भूलती ।
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